कुछ मुक्तक

कुछ मुक्तक

आप विदेशी सफर पर हैं
नहीं अंग्रेज़ी suffer पर हैं
कौन पकड़े आप को यहाँ
आप रोज़ फेसबुक पर हैं ।
आप मुसलसल सफर में हैं
कुछ लोग अगर मगर में हैं
मैं पड़ा रह गया ज़मीं पर
आप फ़लक पै क़मर में हैं ।
मुझे भी साथ ले लिया होता
कुछ तो पुण्य भी किया होता
रोज़ शब्दों से खेलते हो
काम भी कुछ कर लिया होता ।
आप की वाणी सदा आकाशवाणी
वह शहद सी मधुर और क़ल्याणी
धरती पर उतर कर देख तो कभी लेते
कैसे जी रहे हैं मर मर के प़ाणी ।
भक्तजन की भीड़ में मैं भी लगा हूँ
नहीं मैं पण्डित पुजारी का सगा हूँ
माँ शारदे ! मुझे भी दो अपनी कृपा
शब्द की ले आरती मैं भी जगा हूँ ।

–सुधेश

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drsudhesh

मैं मूलत: कवि हूँ , पर गद्य की अनेक विधाओं में लिखता हूँ , जैसे आलोचना , संस्मरण , यात्रा वृत्तान्त , व्यंग्य , आत्मकथा , ललित निबन्ध । मेरी अब तक २८ पुस्तकें छप चुकी हैं । मैं ने दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में २३ वर्षों तक अध्यापन किया । उस के पहले उत्तर प़देश के तीन कॉलेजों में आठ वर्षों तक अध्यापन किया था । मैं तीन बार विदेश यात्रा कर चुका हूँ ।

One thought on “कुछ मुक्तक”

  1. Reblogged this on डा सुधेश and commented:

    मैं ने एक त्रैमासिक पत्रिका सहज कविता वर्षों पहले सम्पादित की थी , जिसे अब इन्टरनेट पर शुरु किया गया है । उसे sahajkavita .wordpress.com पर पढ़ सकते हैं । उस में आप की रचनाओं का स्वागत है ।

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