डा सुधेश की सृजनयात्रा के वि विध पक्ष

डा सुधेश की सृजनयात्रा के विविध पक्ष

डा सुधेश एक सफल कवि हैं ,जिन्हों ने अपनी कविता के माध्यम से युगान्तरकारी
सर्जना की । एक ओर उन की दृष्टि परम्परागत खण्डकाव्य के सृजन में है ,तो दूसरी
ओर उन्हों ने आधुनिक भावबोध की कविताएँ और गीत लिख कर वैश्विक काव्य की
रचना की । उन की काव्य दृष्टि में विचार और भावना का अद्भुत समन्वय है । वे एक
दार्शनिक कवि ही नहीं वरन् आलोचक भी हैं । संस्मरण तथा यात्रावृत्तान्त और आत्म
कथा के क्षेत्र में भी उन की उपलब्धियाँ महत्वपूर्ण हैं ।
सुधेश की कविता में जीवन और जगत की व्यथाकथा का चित्रण है । उन्हों ने अपने
गीतों और कविताओं के माध्यम से जगत की विराट सत्ता की सहज अभिव्यक्ति
प़स्तुत की है । सहजता उन की कविताओं का वैशिष्ट्य है । वे निम्न लिखित ग़ज़ल में
राजनीतिक ऊहापोह और युगीन समस्याओं को अभिव्यक्त करते हैं —
वे मन के मीत नहीं हैं लगते हैं कुछ नेता से
झूठे सच्चे वादों से हम को बहला जायेंगे ।
जो चले नहीं लहरों पर जो चढ़े नहीं पर्वत पर
ऊंचे स्वर में कहते हैं रस्ता दिखला जाएँगे ।
उन का कवि घोर निराशा में भी आशा का सन्देश देता है —
सुन लो सुधेश कवि लाखों जीते हैं इस आशा में
जब धरती स्वर्ग बनेगी नन्दनवन छा जाएँगे ।
सुधेश के दोहे श्रंगारपरक ही नहीं उन में युग की व्यथा का भी यथार्थ वर्णन है । उन
के इन दोहों में युगीन स्थिति का सटीक वर्णन मिलता है —
चाहे जितना शोर कर संसद कर दो ठप्प
टी ए , डी ए खाय के सुडको लंच सुड़प्प ।
एक टर्म एम पी हुआ मोटी होती चर्म
चार पीढ़ियाँ खांयगी बिना किये कुछ कर्म ।
सुधेश के गीतों में प़कृति और मानवीय संवेदनाओं की अद्भुत छटा विस्तीर्ण हुई
है । वे अनन्त सृष्टि विस्तार को देखने के लिए नीलगगन में जाना चाहते हैं —
दो पंख दिये होते
उड़ जाता पंख पसार ।
बगिया के काँटों से बचकर
माली के हाथों से बच कर
उड़ जाता मैं नील गगन में
है जहाँ सृष्टि विस्तार ।

कवि की ” जीवन होता पहाड़ ” कविता में जीवन को विविध रूपों में देखने का प़यास किया गया है । उस की इस सार्वकालिक रचना में जीवन का सर्जनात्मक
सन्देश निहित है —
जीवन होता
अणुध्वस्त सतत पतझर का साक्षी बंजर
संस्कृतियों के स्वर्णयुगों का खंडहर
इतिहासों का मलबा कूड़ाघर
अगर न शीश उठाता
पत्थर में से छोटा अंकुर ।
कवि जीवन की क्षणभंगुरता से आहत होकर एक गीत में लिखता है —
लेखनी लिख ले कि जो लिखना ज़रूरी
क्या पता कल रौशनाई सूख जाये ।
सुधेश का सर्वाधिक चर्चित खण्डकाव्य निर्वासन है जिस में महाभारत के
पाण्डवों के वनवास और फिर अज्ञातवास के प्रसंग वर्णित हैं । कवि का संकेत है
कि आज भी विश्व मानव कहीं न कहीं निर्वासन भुगत रहा है । उस की त्रासदी
पाण्डवों से भिन्न नहीं है , बल्कि उन से अधिक दयनीय है । विश्व स्तर पर अनेक
ऐसे समुदाय हैं जो निर्वासन के शिकार हैं । यह खण्ड काव्य षड़यन्त्र , पापलीला ,
पश्चाताप , निर्वासन और अज्ञातवास शीर्षकों में विभक्त है । कवि ने इस में विभिन्न
काव्यरूपों , छन्दों और शैलियाँ का प़योग किया है ।
कवि ने पहले खण्ड षड़यन्त्र में लिखा —
सृष्टि का चक़ चला है जब से
सूरज रथ पर सवार हो निकला
चन्द़ ने श्वेत चन्द्रिका वितान ताना
नक्षत्रों ने आँखें झपकाना शुरु किया
ग़हों ने दिशा बदली
कभी धूप छाया कभी आँधी वर्षा का प़ताप
विकट संकटों बीच घिरा मानव
रहा खोजता सुख ।
मानव का लक्ष्य सुख है । यह एक चिरन्तन सत्य है ।
कवि ने अज्ञातवास सर्ग में सैरन्ध़ी के चीत्कार से नारी की व्यथा प़कट की है ।
सुधेश जी की काव्यधारा में मानवता की प्रमुखता है । वे अतीत से वर्तमान को जोड़ कर भविष्य की दिशा खोजते हैं ।
सुधेश हिन्दी के समालोचकों में से एक हैं । उन के दस आलोचनात्मक ग़न्थ इस
बात के प़माण हैं । उन्हों ने यूरोप के अनेक देशों , अमेरिका , दक्षिणी कोरिया और
भारत के विभिन्न अंचलों का भ़मण किया । इन यात्राओं के रोचक संस्मरण पत्रिकाओं
और उन की तीन पुस्तकों के माध्यम से हिन्दी पाठकों तक पहुँचे ।
वे एक सफल उपन्यासकार भी हैं । रेत के टीले उपन्यास में उन्हों ने मानव के विविध
पक्षों का चित्रांकन किया है । वे आधुनिक युग के एक श्रेष्ठ आत्मवृत्तकार भी हैं , जिस
का प़माण उन की आत्म कथा रंग बेरंग है ।
डा सुधेश की सृजनयात्रा के अनेक रूप और पड़ाव हैं । उन का मूल्य इस बात में है कि
वे पाठकों को निरन्तर दर्शन की वैचारिकता और रस की अनुभूति कराने में समर्थ है ।

डा चक़धर नलिन ( लखनऊ )
[ श्रेणी आलोचना बी १ बी २ चक़धर – नलिन — सुधेश ]

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Published by

drsudhesh

मैं मूलत: कवि हूँ , पर गद्य की अनेक विधाओं में लिखता हूँ , जैसे आलोचना , संस्मरण , यात्रा वृत्तान्त , व्यंग्य , आत्मकथा , ललित निबन्ध । मेरी अब तक २८ पुस्तकें छप चुकी हैं । मैं ने दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में २३ वर्षों तक अध्यापन किया । उस के पहले उत्तर प़देश के तीन कॉलेजों में आठ वर्षों तक अध्यापन किया था । मैं तीन बार विदेश यात्रा कर चुका हूँ ।

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