राही अजानी राह का

राही अजानी राह का

राही अजानी राह का हूँ
चलना काम मेरा
घुप अंधेरी गुफ़ा में विश्राम कर
चल पड़ा था टेढ़े रास्तों पर
अंधे मोड़ से अंधे मोड़ तक
हर मोड़ पर मिले हमदर्द
कटारी आँख ख़ंजर हाथ वाले
हंस कर लूटते हैं स्वत्व
एक ने तो पेट पर ही लात मारी
चारों ख़ाने चित्त मैं
तारे दिखे दिन में
स्वप्न चकनाचूर
उन की किरच चुभती अभी तक आँख में
दधीची हड्डियाँ विरासत में मिली थीं
उठ कर चल दिया फिर वज़ का निर्माण करने ।

मंज़िल का निशाँ ग़ायब
पर राह वेश्या की तरह फैली पड़ी
उठा मस्तक राजपथ पर आगया
सिंहासन दिखा ख़ाली
बढ़ा उस की ओर
मगर उस पर धरा बौना
बैसाखी की कृपा से
बैसाखी संभाले थे
चोर ठग मक्कार पूरे चार
पराजित कर्ण सा मैं चल दिया
जीतने महांभारत नया ।
कुरुक्षेत्र अज भी फैला पड़ा है दुश्शासनों दुर्योधनों का वही आतंक
शकुनि हँसते फिर रहे हैं
मन्त्र देते मोटी फ़ीस ले कर
मेरे पास तो संकल्प कोरें
स्वप्न के अवशेष चाह के कंकाल
उन से क्या बनेगा ?
रद्दी फूंक कर नहीं चूल्हा जलेगा
घर में लगा कर आग
न होती रोशनी ।
उधर बौने बजाते दुन्दुभी
राजपथ पर जा रहे हैं
सिंहासन निकट जा कर रुकेंगे
रेवड़ी जहाँ बँटती पुरस्कारों की
जीभें लपलपाती हैं
लारें टपकती हैं
दाँतों की हँसी के बीच ।
अन्धे मोड़ पर खड़ा मैं
देखता हूँ दूर से
झाड़ियों की ओट से
अन्धे बाँटते हैं रेवड़ी अन्धों को ।
अकेला खड़ा हूँ
अजानी राह पर
मगर चलना पड़ेगा
अन्धे मोड़ से अन्धे मोड़ तक ।

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drsudhesh

मैं मूलत: कवि हूँ , पर गद्य की अनेक विधाओं में लिखता हूँ , जैसे आलोचना , संस्मरण , यात्रा वृत्तान्त , व्यंग्य , आत्मकथा , ललित निबन्ध । मेरी अब तक २८ पुस्तकें छप चुकी हैं । मैं ने दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में २३ वर्षों तक अध्यापन किया । उस के पहले उत्तर प़देश के तीन कॉलेजों में आठ वर्षों तक अध्यापन किया था । मैं तीन बार विदेश यात्रा कर चुका हूँ ।

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