कुछ और ग़ज़लें मेरी

सन २०१० ई में मेरा ग़ज़ल संग़ह हादसों के समुन्दर छपा था । उस में से दो ग़ज़लें आप को यहाँ भेंट कर रहा हूँ —
राह में राही ने पत्थर नहीं देखा
चाह ने नदिया या समुन्दर नहीं देखा ।
नाभि में कस्तूरी लिये भटका वो जंगलों
चाह के मृग ने कभी अन्दर नहीं देखा ।
आँख रही देखती उस रूप का जलवा
आप ने पर कभी मुड़ कर नहीं देखा ।
हाथ न छू पाए आकाश की सीमा को
पाँव ने धरती पै उतर कर नहीं देखा ।
एक जहाँ बाहर कितना हसीन है
झाँक के तुम ने कभी अन्दर नहीं देखा ।
आह रहे भरते बस अपने दर्द पर
आँख उठा अपने से बाहर नहीं देखा ।

उजड़ कर हर एक मेला रह गया अन्त में दर्शक अकेला रह गया ।
सुखों की चाँदनी में तुम नहा लो
सीस पर कोई दुपहरी सह गया ।
हर शमा के साथ इक परवाना है
मैं ही महफ़िल में अकेला रह गया ।
हँसते हँसते आदमी रोने लगा
काल आ कर कान में क्या कह गया ।
हर किसी के साथ में सारा जहाँ
भीड़ में मैं ही अकेला रह गया ।
हवामहलों से हवा यह कह गई
एक दिन पुख़्ता क़िला भी ढह गया ।

कुछ बाद की ग़ज़लें देखिए —-

मुहब्बतें ही यहाँ मुहब्बतें मुहब्बतें
ज़िन्दगी की यही हैं राहतें राहतें ।
बनाओगे कब तक यों दुनिया को दोज़ख़
चलेंगी कहाँ तक ये नफरतें नफरतें ।
उम़ भर आरज़ू का सफ़र चलचलाचल
आख़िरी वक़्त भी बची हसरतें हसरतें ।
उम़ भर पालते ही रहे दुश्मनी को
मरने के बाद ज़िन्दा रहीं ये चाहतें ।
नहीं वक़्त लगता है रुसवाई में तो
यहाँ मरने पर ही मिलती हैं इज़्ज़त्तें ।

पीपल के नीचे दिया जले
विरहन का मानो जिया जले ।
जो किसी याद में खोई सी
मेरी आँखों में दिया जले ।
रावण लंका में गरज रहा
उपवन में बैठी सिया जले ।
प़ीतम विदेश में खटता है
घर में घुटती राबिया जले ।
जंगल में घोर अंधेरे को
आलोकित करने दिया जले ।
पीपल पर भूतों का डेरा
क्या उन्हें भगाने दिया जले ।।
पीपल पर दुबके हैं पंछी
उन को शंका आशियाँ जले । ।
दीपक से आग चुरा कर के
पटना राँची हल्दिया जले । । ( सुधेश )

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drsudhesh

मैं मूलत: कवि हूँ , पर गद्य की अनेक विधाओं में लिखता हूँ , जैसे आलोचना , संस्मरण , यात्रा वृत्तान्त , व्यंग्य , आत्मकथा , ललित निबन्ध । मेरी अब तक २८ पुस्तकें छप चुकी हैं । मैं ने दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में २३ वर्षों तक अध्यापन किया । उस के पहले उत्तर प़देश के तीन कॉलेजों में आठ वर्षों तक अध्यापन किया था । मैं तीन बार विदेश यात्रा कर चुका हूँ ।

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