कुछ ताज़ा ग़ज़लें

कुछ ताज़ा ग़ज़लें

काश उस महफ़िल में हम होते सामने फिर तो सनम होते ।
सामने जब असलियत आती
टूटते सब ही भरम होते ।
क्या ज़माने क्या सलीक़े थे
आज के तो बेशरम होते ।
देख लेते हुस्न का जलवा
काश उस महफ़िल में हम होते ।
आप होते मेहरबाँ इतने
भाग में ऐसे न ग़म होते ।
देख कर के आज की दुनिया
हौसले जीने के कम होते ।

मासूम तेरी ज़ुल्फ़ों के पेचोख़म नहीं हैं
दुनिया के रास्तों में भी मोड़ कम नहीं हैं ।
कितना चलें सँभल कर फिर भी तो राह भूलें
इस ज़िन्दगी में कम तो पेचोख़म नहीं हैं ।
आएगा एक दिन वो दुनिया बनेगी बेहतर
उन को यक़ीं नहीं है हम को भरम नहीं हैं ।
सब आधुनिक हुए हैं वे इस लिए हैं नंगे
लज्जा से मर गये हम उन को शरम नहीं है ।
हम ने वफ़ा को माना है ईमान के बराबर
तेरी जफ़ाओं से कम तेरे सितम नहीं हैं ।

ढूँढते जिगरी मुहब्बत
मुफ़्त ले लो यहाँ नफ़रत ।
जो हुए बदनाम हर सू
मिल गई दुनिया में शोहरत ।
जब ने तेरी चाह पाई
अब न बाक़ी कोई चाहत ।
रंक राजा में न अन्तर
प्यार की सब को ज़रूरत ।
क्यों बनाया इसे दोज़ख़
अब कहाँ दुनिया में जन्नत ।

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Published by

drsudhesh

मैं मूलत: कवि हूँ , पर गद्य की अनेक विधाओं में लिखता हूँ , जैसे आलोचना , संस्मरण , यात्रा वृत्तान्त , व्यंग्य , आत्मकथा , ललित निबन्ध । मेरी अब तक २८ पुस्तकें छप चुकी हैं । मैं ने दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में २३ वर्षों तक अध्यापन किया । उस के पहले उत्तर प़देश के तीन कॉलेजों में आठ वर्षों तक अध्यापन किया था । मैं तीन बार विदेश यात्रा कर चुका हूँ ।

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