मेरी कविताएँ

राही अजानी राह का

राही अजानी राह का हूँ
चलना काम मेरा
घुप अंधेरी गुफ़ा में विश्राम कर
चल पड़ा था टेढ़े रास्तों पर
अंधे मोड़ से अंधे मोड़ तक
हर मोड़ पर मिले हमदर्द
कटारी आँख ख़ंजर हाथ वाले
हंस कर लूटते हैं स्वत्व
एक ने तो पेट पर ही लात मारी
चारों ख़ाने चित्त मैं
तारे दिखे दिन में
स्वप्न चकनाचूर
उन की किरच चुभती अभी तक आँख में
दधीची हड्डियाँ विरासत में मिली थीं
उठ कर चल दिया फिर वज़ का निर्माण करने ।

मंज़िल का निशाँ ग़ायब
पर राह वेश्या की तरह फैली पड़ी
उठा मस्तक राजपथ पर आगया
सिंहासन दिखा ख़ाली
बढ़ा उस की ओर
मगर उस पर धरा बौना
बैसाखी की कृपा से
बैसाखी संभाले थे
चोर ठग मक्कार पूरे चार
पराजित कर्ण सा मैं चल दिया
जीतने महाभारत नया ।

माँ की याद

मेरे खुरदुरे माथे पर
अंकित हैं कई कई दु:ख
पर माँ की ममता की बदली के नीचे
ओझल था पहाड़ सा दु:ख ।
माँ
एक शब्द नहीं
महाकाव्य है
ममता व्यथा समर्पण का
जिसे सुनता रहा अनेक अनेक वर्षों तक
अब भी उस का स्वर
गूँजता है कानों में ।
अब मेरा माथा
दु:खों की चोट से
और खुरदुरा हो गया है
उम़ की सलवटों ने
कर दिया उसे बदरंग
पर अब भी
माँ की याद आने पर
आँखों में उतर आता है सावन ।

माँ की मौत

माँ की मौत
ख़बर नहीं अख़्बार की
जो सुन कर बासी हो जाए
पढ़ कर फेंक दी जाए ।
माँ की मौत
एक चीख़ है
दिल की घाटियों की गूँज
रात के सन्नाटे में ,
एक टीस है
भीतर कहीं से उठ कर
धमनियों में ख़ून के साथ बहती है
मनहूस उदास एकान्त में ।
माँ की मौत है
ममता का अकाल
ज़िन्दगी के एहसास में कमी
विश्वास को गहरी ठेस
भरी पूरी दुनिया का शून्य
भीड़ में अकेलेपन की चोट ।
काश ! मैं यह सब समझता
माँ के रहते ।

डा सुधेश

अपने घरों में बेघर हुए जो

तीर्थ यात्री लौटे घरों को
अपने घरों में बेघर हुए जो
कहाँ जाएँ ?
संवेदना के शब्द सारे चुक गये
हमदर्दी के ग़ुब्बारे फटे
उन की वेदना के सिन्धु की गहराई अतल
आँसू नदी के रेत से सूखे
आकाश छत नीचे
उपल के बिस्तरे पर
खुली आँखों
देखते हैं स्वप्न उजड़े घरों के ।
पहाड़ी बाढ़ में बह गये घर द्वार
छोटे बड़े बाज़ार
हर तरफ़ शवों के अम्बार
जीवित शिव पलों में शव हो गये ।
पर्वतों के बीच में की ज़िन्दगी
पर्वत से न कम थी सख़्त
अब प़लय की त्रासदी ने
पर्वतों के देवताओं को शरणार्थी बनाया
राहत केन्द़ में लाइन में खड़े हैं ।
स्वर्ग धरती के
नरक में हो गये परिणत
पावन तीर्थ भी मानो अपावन
देखते बस रह गये भगवान
उन के भक्त सिन्धु आँखों में लिये ।
किस के पाप का परिणाम है यह महा प़लय ?
प़गति की दौड़ में अन्धे बने
मनुज की लालसा ने
प़कृति को नटी सी नचाया
त्रासदी के मंच पर
त्रासद अन्त पाया ।

ख़ुशी के आँसू

दु:ख में आँसू निकलते हैं
आँसू और दु:ख का रिश्ता
मैं ने स्वयम् भोगा है
कँटीली ज़िन्दगी की राह में जब
किसी ने छुई दुखती नब्ज़
नयन आकाश में घुमड़ने लगे बादल
मन की धरा गीली
युग के ताप में क्या कमी आई ?
लेकिन ख़ुशी के आँसू
देखे पिता की आँख में
मेरे पास होने की ख़बर
लघु सफलता की ख़बर कोई
जब उन्हें छू कर गई
बूढ़ी आँख में सावनी बरसात उतरी ।
आँसू दु:ख की सन्तान
पर ख़ुशी के भी सगे भाई ।

 

शताब्दी किस ने देखी है

हर दिन शुरु होता है
सुबह की ताज़गी
गुनगुनी धूप से
रोटी के राग के साथ
बीत जाता है
उदास शाम के धुँधलके में ।
दिन बदलता है सप्ताह में
जो शुरु होता है
नए संकल्प के साथ
हर काम लेकिन टलता है
अगले सप्ताह के लिए ।
देखते देखते
सप्ताह बदल जाता है महीने में
जो शुरु होता है नए जोश के साथ
ख़त्म होता है
रोज़ कम होने वाले मासिक वेतन सा ।
बारह महीनों बाद
आता है नया वर्ष
जो शुरु होता है ढेरों बधाइयों
नई योजनाओं के साथ
जो रह जाती बन पंचवर्षीय योजना
सिर्फ काग़ज़ पर ।
वर्षों बाद
शताब्दी किस ने देखी है
बस आदमी रोज़ जीता है
रात को मरता है ।

_ सुधेश
३१४ सरल अपार्टमैन्ट्स , द्वारिका , सैैक्टर १० , नई दिल्ली ११००७५
फ़ोन ९३५०९७४१२०

 

Advertisements

Published by

drsudhesh

मैं मूलत: कवि हूँ , पर गद्य की अनेक विधाओं में लिखता हूँ , जैसे आलोचना , संस्मरण , यात्रा वृत्तान्त , व्यंग्य , आत्मकथा , ललित निबन्ध । मेरी अब तक २८ पुस्तकें छप चुकी हैं । मैं ने दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में २३ वर्षों तक अध्यापन किया । उस के पहले उत्तर प़देश के तीन कॉलेजों में आठ वर्षों तक अध्यापन किया था । मैं तीन बार विदेश यात्रा कर चुका हूँ ।

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s