मन तो जवान है

मन तो जवान है ।

तन कुछ वयोवृद्ध है
कुछ काल क्रुद्ध है
परवाह नहीं है कुछ
मेरा मन तो जवान है ।
आँखों की ज्योति मन्द
न रहा पढ़ने का आनन्द
अग जग को पढ़ता जो
मेरा मन तो जवान है ।
कान सुनते हैं कम
न रहा निन्दा का ग़म
फ़िल्मी गीतों से वंचित
मेरा मन तो जवान है ।
दाँत कुछ टूटे घिस कर
फिर भी खाता हूँ छक कर
नक़ली दाँतों से हँसता
मेरा मन तो जवान है ।
टाँग में ठहरी पीड़ा
छूट गई है क्रीड़ा
हाथ जब तक लिखता
मेरा मन तो जवान है ।
रीढ़ हड्डी थी सीधी
कमबख़्त हुई क्यों टेढ़ी
वक्र है चोटी से एड़ी
मेरा मन तो जान है ।
बूढ़ा होता है तन
नित नूतन है मन
इसी लिए तो कहता
मेरा मन तो जवान है ।
नए विचारों का संग है
जग मुझ से कुछ तंग है
जवानों की संगति में
मेरा मन तो जवान है ।
कहो जवानी की जय
न मानो कभी पराजय
उम्र सफ़र जारी है
मेरा मन तो जवान है ।
— सुधेश

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drsudhesh

मैं मूलत: कवि हूँ , पर गद्य की अनेक विधाओं में लिखता हूँ , जैसे आलोचना , संस्मरण , यात्रा वृत्तान्त , व्यंग्य , आत्मकथा , ललित निबन्ध । मेरी अब तक २८ पुस्तकें छप चुकी हैं । मैं ने दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में २३ वर्षों तक अध्यापन किया । उस के पहले उत्तर प़देश के तीन कॉलेजों में आठ वर्षों तक अध्यापन किया था । मैं तीन बार विदेश यात्रा कर चुका हूँ ।

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