मेरा ताज़ा गीत”‘

जीवन तो संग्राम

किस को कितना जीना है
कितना विष हालाहल पीना है
किसी को भी पता नहीं है ।

इन थकी उनींदी आँखों में
रंगीन स्वप्न के चिर डेरे हैं
तन मन के चारों ओर मगर
जड़ बाधाओं के निर्मम घेरे हैं ।
जीवन तो है संग्राम भयंकर
यह शराब का नशा नहीं है ।
हल्दी की गाँठ मिली जिस को
बन्दर झट पन्सारी बन बैठा
जो धुप्पल में कुर्सी पर जा बैठा
संत्री भी मन्त्री सा तन कर ऐंठा ।
अपना हक़ भीख में मिला कहाँ
उसे छीनो तो कोई ख़ता नहीं है ।
आपा धापी छीना झपटी के युग में
जन अभिजन में चूहा दौड़ मची है
कहाँ समन्वय सामाजिक न्याय कहाँ
मानव गरिमा की चमक नहीं बची है ।
दान में पाया जो स्वर्णकलश भी
तो जीने का कोई मज़ा नहीं है ।

— सुधेश

श्रेणी   गीत

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drsudhesh

मैं मूलत: कवि हूँ , पर गद्य की अनेक विधाओं में लिखता हूँ , जैसे आलोचना , संस्मरण , यात्रा वृत्तान्त , व्यंग्य , आत्मकथा , ललित निबन्ध । मेरी अब तक २८ पुस्तकें छप चुकी हैं । मैं ने दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में २३ वर्षों तक अध्यापन किया । उस के पहले उत्तर प़देश के तीन कॉलेजों में आठ वर्षों तक अध्यापन किया था । मैं तीन बार विदेश यात्रा कर चुका हूँ ।

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