मेरी ताज़ा कविता

मेरी ताज़ा कविता

भाग्य और नियति

मैं भाग्यवादी नहीं
पर मेरे साथ
जो अघटित घटा
या घट रहा है या घटेगा
है मेरी नियति ।
भाग्य तो धोखा है
हसीन ख़्वाब सा
जिसे देखते देखते
कई बचपन बुढ़ा गये
फिर भी अन्धी आँखों में है
आशा की ज्योति ।
घटित और अघटित के बीच
जीवन बीत रहा
घड़ी के पैन्डुलम सा ।

— सुधेश

श्रेणी   Kavita ,  Sudhesh ,  bhagya

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Published by

drsudhesh

मैं मूलत: कवि हूँ , पर गद्य की अनेक विधाओं में लिखता हूँ , जैसे आलोचना , संस्मरण , यात्रा वृत्तान्त , व्यंग्य , आत्मकथा , ललित निबन्ध । मेरी अब तक २८ पुस्तकें छप चुकी हैं । मैं ने दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में २३ वर्षों तक अध्यापन किया । उस के पहले उत्तर प़देश के तीन कॉलेजों में आठ वर्षों तक अध्यापन किया था । मैं तीन बार विदेश यात्रा कर चुका हूँ ।

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