आत्म चिन्तन


  • आत्म चिन्तन

महत्त्वाकांक्षा

जीवन में महत्त्वाकांक्षा ने मुझे दु:ख दिये पर जब अल्प सन्तोषी बनने की कोशिश की तो दुनिया ने मुझे कायर समझा । पर जीवन संध्या में आकाँक्षाएं मेरा पीछा नहीं छोड़ रहीं । बल्कि नई नई इच्छाएँ पैदा हो रही हैं । क्या यह बुझते दीपक की बढ़ती लौ है?
मैं ने देखा और स्वयम् अनुभव किया कि महत्वाकांक्षी लोग जीवन में अधिक घुटते हैं और अल्प सन्तोषी मज़े में रहते हैं पर उन्हें मिलता कुछ नहीं । दिए की बुझती लौ की बात मैं ने मौत की ओर बढ़ते जीवन के सन्दर्भ में लिखी थी । अपने जीवन का कच्चा चिट्ठा मैं ने अपनी आत्मकथा के तीन भागों में लिखा है , जिस का पहला भाग छप गया है ।

निन्दा

आप सब की निन्दा करें तो सब को दुश्मन बना लेंगे । आप सब की तारीफ़ करें तो सज्जन तो कहला सकते हैं पर आप विवेक हीन ख़ुशामदी माने जाएँगे । इस लिए बुरे को बुरा कहना और अच्छे को अच्छा कहना ज़्यादा व्यावहारिक है । ख़ुशामद का लाभ तो मिल सकता है पर ख़ुशामदी अच्छा नहीं माना जाता । सब की निन्दा करने वाला किसी को मित्र नहीं बना सकता । मित्रों के बिना जीवन एक रेगिस्तान की तरह है । तो अच्छा यह होगा कि दूसरों की निन्दा न करें या कम से कम करें और किसी आधार पर करें । दूसरे की तारीफ़ भी किसी आधार पर
करें । पर दूसरे की प्रशंसा निन्दा की तुलना मे निरापद है ।
हिन्दी में विविध लेखन की आवश्यकता

हिन्दी को विविध लेखन द्वारा इतनी समृद्ध कर दें कि अंग़ेज़ी उस के सामने बौनी लगे । पर यह काम दशकों में पूरा होगा । भारतीय वैज्ञानिक और समाजविज्ञानों के विद्वान प्राय: हिन्दी में नहीं लिखते । उन्हें कैसे समझाया जादए? वे हिन्दी कम जानते हैं या नहीं जानते और यदि जानते भी हैं तो वे अंग़ेज़ी में लिखना पसन्द करते हैं । केवल साहित्य की समृद्धि से कुछ नहीं होगा । पर उत्कृष्ट साहित्य का महत्त्व कम नहीं है । हिन्दी का दुर्भाग्य है कि उस में उत्कृष्ट
साहित्य भी कम लिखा जा रहा है ।
जैसे प्राचीन काल मे संस्कृत में अनेक विषयों पर , यहाँ तक कि पशु चिकित्सा पर भी , साहित्य रचा गया , वैसे हिन्दी में आजकल अनेक विषयों पर क्यों नहीं लिखा जा रहा है? विज्ञान , यान्त्रिकी आदि पर जो ग्रन्थ लिखे भी,
गये उन का प्रचार नहीं हुआ , क्योंकि उन्हें कोई पढ़ता नहीं या बहुत कम लोग उन का लाभ लेते हैं । कारण यहीं कि शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी है।
जन कविता और लोकप्रिय कविता

जनकविता के प्रति कविता प्रेमियों की चिन्ता उचित है पर लोकप्रिय कविता केवल जनकविता ही नहीं होती स्तरीय , उच्च कविता भी होती है । मंचों पर मिली लोकप्रियता सामयिक होती है । स्थायी और कालातीत लोकप्रियता उस कविता को मिलती है जो कविता के उच्च मानदण्डों पर खरी उतरती है । हर युग में जो कवि कविता का नया रूप और उच्च स्तर सामने रखता है वह कविता विधा को आगे बढ़ाता है । केवल मंचों की वाहवाही कविता के उच्च स्तर का मानदण्ड नहीं है ।
आजकल संचार माध्यमों के सहारे लोकप्रियता पाने की होड़ लगी हुई है । जो कविता संचारमाध्यमों की
सीढ़ी पर चढ़ कर लोकप्रिय होने का दावा करती है , उस की तथा कथित लोकप्रियता सच्ची लोकप्रियता
नहीं है । हज़ारों सालों से जो कवि और कलाकार जनता के दिलों में बसे हुए हैं , वे संचार के साधनों के
अभाव मे कैसे जनता में लोकप्रिय हो गये ।
तो कहना होगा कि तथा कथित लोकप्रिय कविता अनिवार्यत: जन कविता नहीं है , जैसे लोक साहित्य
जन साहित्य या जनता का साहित्य होता है । जन कविता लोकप्रिय भी होगी ।
लोकप्रिय कविता का मतलब सस्ती कविता नहीं है , सस्ती कविता अर्थात घटिया कविता या साहित्य ।।
सस्ते साहित्य को घासलेटी साहित्य या लुगदी साहित्य भी कहा गया । सस्ते का मतलब कम क़ीमत का नहीं
बल्कि जिस का साहित्यिक मूल्य या गुण कम हो ।
तो लोकप्रिय कविता , जन कविता , सस्ती कविता शब्दों का एक ही अर्थ नहीं है। उन के मर्म को समझ कर उन में भेद करने की आवश्यकता है ।

समय  से संवाद

हिन्दी में साहित्य प्रचुर मात्रा में लिखा जा रहा है , पहले भी लिखा गया , पर उस से अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि वह समय से संवाद करता है या नहीं। समय आज का है । वह पहले का भी था और भविष्य का भी होगा ।
जो साहित्य आज के समय ,बीते कल और आगामी कल से भी संवाद करता है , वस्तुत: वही समय से संवाद करता है ।

एक अनुभव

कल कुछ सामान लेने घर से बाज़ार की ओर चला । ऊँचे फुटपाथ पर चढ़ते हुए पाँव असन्तुलित हो गया । मैं कमर के बल सड़क में धड़ाम से गिरा । पास खड़ा एक रिक्शे वाला दौड़ कर मेरे पास आया और मेरे दोनों हाथ पकड़ कर मुझे खड़ा किया । दिल्ली में अधिकांश रिक्शे वाले बिहारी हैं । वह अपनी बिहारी हिन्दी में बोला – बाबा, इस उमरिया में घर से बाहर ना निकला करो । चलो रिक्शा पर बैठो , घर छोड़ आता हूँ । मैं उस में बैठ कर घर के पास तक आया । उसे कुछ रुपये देने लगा तो वह बोला – ना बाबा , आप की सेवा का मौक़वा मिला । रुपये तो बहुत कमा लूँगा । ससुरी आज की पीढ़ी तो बज़ुर्गों की सेवा करती नहीं । घर लौटते हुए मैं सोच रहा था कि एक मुम्बई में राज ठाकरे है जो मानता और खुल कर कहता है कि मुम्बई में जितने अपराध होते हैं बिहार और यूपी के लोग करते हैं । एक बिहारी मुझे कल मिला जिस ने मुझे सड़क से उठाया और बाबा का सम्बोधन दिया और रिक्शा में बिठा कर मुझे निश्शुल्क घर छोड़ गया । मेरा यह विश्वास द्ृढ़ हुआ कि ग़रीब लोग प़ाय: मानवीयता से सम्पन्न होते हैं । तथा कथित छोटे भी महान होते हैं और तथाकथित महान भी नीच हो सकते हैं।

आत्म कथा लेखन

महा पुरुषों की जीवनी अन्य लोग लिखते हैं .जिन की जीवनी कोई नहीं लिखता वे स्वयं आत्म कथाड लिखते हैं जिस में वे स्वयं को महान बना देते हैं । तो क्या आत्म कथा में झूट का सहारा लिया जाता है .पर सत्य के प्रयोग के व्रती महात्मा गांधी.जवाहर लाल नेहरु ,डॉ राजेन्द्र प्रसाद आदि महापुरुषों ने अपनी आत्म कथाओं में जो लिखा क्या वह झूठ है ? गांधी जी की जीवनी फ्रेंच लेखक रोमां रोलां ने फ्रेंच में लिखी थी । गांधी जी पर कितनी कवितायें ,खंड काव्य ,महा काव्य आदि लिखे गए .फिर भी उन्हों ने आत्म कथा क्यों लिखी ? मेरा विचार है कि लेखक की हर रचना सीमित अर्थ में उस की लघु आत्म कथा है । फिर आत्म कथा लिखने से इतना परहेज़ क्यों ?.यह भी साहित्य की एक विधा है जिस में बहुत सारा साहित्य लिखा गया है ,पर इस के लिए ईमानदारी , ,तटस्थता ,और साहस की ज़रूरत है ।
मिथक की उपयोगिता

राम एक मिथक या अन्ध विश्वास हो सकते हैं पर वे अरबों ख़रबों के दिलों में बसे हुए हैं । समाज की मानसिक रचना में मिथकों की भी भूमिका है । मिथकों का आधार कभी इतिहास होता है , कभी धर्म और कभी कोई सशक्त रचना , पर उन्हें जीवन से ख़ारिज नहीं किया जा सकता । वाल्मीकि ने राम के मिथक को महाकाव्य बना दिया , जिस के आधार पर न जाने कितनी रचनाएँ लिखी गईं । महाभारत महाकाव्य ने कृष्ण के मिथक को फैलाया , जिस के आधार पर न जाने कितने काव्य , उपन्यास आदि लिखें गये । तो राम और कृष्ण गल्प होते हुए भी हिन्दू मानसिकता के अंग हैं । यह भी विचारणीय है ।
— सुधेश
३१४ सरल अपार्टमैन्ट्स , द्वारिका , सैैक्टर १० नई दिल्ली ११००७५
फ़ोन ०९३५०९७४१

श्रेणी    वैचारिक  गद्य

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मेरा ताज़ा गीत”‘

जीवन तो संग्राम

किस को कितना जीना है
कितना विष हालाहल पीना है
किसी को भी पता नहीं है ।

इन थकी उनींदी आँखों में
रंगीन स्वप्न के चिर डेरे हैं
तन मन के चारों ओर मगर
जड़ बाधाओं के निर्मम घेरे हैं ।
जीवन तो है संग्राम भयंकर
यह शराब का नशा नहीं है ।
हल्दी की गाँठ मिली जिस को
बन्दर झट पन्सारी बन बैठा
जो धुप्पल में कुर्सी पर जा बैठा
संत्री भी मन्त्री सा तन कर ऐंठा ।
अपना हक़ भीख में मिला कहाँ
उसे छीनो तो कोई ख़ता नहीं है ।
आपा धापी छीना झपटी के युग में
जन अभिजन में चूहा दौड़ मची है
कहाँ समन्वय सामाजिक न्याय कहाँ
मानव गरिमा की चमक नहीं बची है ।
दान में पाया जो स्वर्णकलश भी
तो जीने का कोई मज़ा नहीं है ।

— सुधेश

श्रेणी   गीत