2015 in review

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भारतीय भाषाओं में समान तत्त्व

श्रेणी   आलोचना –  निबन्ध

टैग  भारतीय भाषाएँ – समानता – समान तत्त्व
भारतीय भाषाओं में समान तत्त्व

भारतीय भाषाओं में और उन के साहित्य में अनेक समानताएं या समान त्तत्त्व हैं
, जिन की यहां चर्चा न कर के मैं उन की भाषिक समानताओं के बारे में कुछ कहना
चाहता हूं । पहले लिपि को लीजिये । उत्तर भारत की अनेक भाषाओं की लिपि
देव नागरी या उस में परिवर्तन कर बनी लिपि है । गुजराती , मराठी , बंगला और
पंजाबी की लिपियां ऐसी ही हैं । सिन्धी अब फ़ारसी लिपि में लिखी जाती है , पर
उस की पुरानी लिपि शारदा लिपि थी , जो ब़ाह्मी लिपि से निकली थी । यही कहानी
कश्मीरी भाषा की है जो पहले शारदा लिपि में लिखी जाती थी , पर अब फ़ारसी
लिपि में लिखी जाती है । पर यह भी रोचक है कि अनेक कश्मीरी और सिन्धी अपनी
भाषाओं को देवनागरी में लिखने का अभियान चला रहे हैं । तो ये भाषाएं अब दोनों
लिपियों में लिखी जा रही हैं ।उर्दू की लिपि फ़ारसी है , पर हिन्दी और उर्दू में लिपि के
अन्तर के बावजूद दोनों भाषाएँ सगी बहनें हैं । यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि उर्दू
का ढेर सारा साहित्य देवनागरी लिपि में प़काशित हो चुका है । पर उर्दू प़ेमी फ़ारसी
लिपि को ही उर्दू की अनिवार्य लिपि मानते हैं । तो फ़ारसी लिपि का उर्दू से और
देवनागरी का हिन्दी से गहरा और अटूट सम्ब्न्ध हो गया है ।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि अधिकांश भारतीय भाषाओं में लिपि की काफी
समानता है , क्योंकि वे देव नागरी या उस से विकसित लिपियों और मिलती जुलती
लिपियों में लिखी जा रही हैं । कुछ भारतीय भाषाओं , जैसे तमिल , तेलुगु , मलयालम ,
कन्नड़ की लिपियाँ अलग अलग हैं ।
अब अनेक भारतीय भाषाओं की शब्दसम्पदा को देखें । हिन्दी , बंगला , तेलुगु ,
तमिल , मलयालम , गुजराती , मराठी और पंजाबी में अनेक संस्कृत शब्द हैं । उर्दू
भी संस्कृत शब्दों से ख़ाली नही है । संस्कृत यौवन ही उर्दू में ज़ोबन बन गया है ।
संस्कृत का कर्म ही उर्दू , हिन्दी में काम और कार्य ही काज , कारज बन गये हैं ।
संस्कृत का कर्म पंजाबी में कम्म , त्वमसि का तुसि ,अस्मि का असि बन गया है ।
अस्मि बंगला में आमि हो गया है । त्वमसि , अस्मिन , अस्मि आदि की छाया
हिन्दी के है , हैं , हो , मैं , हम , तुम में मिलती है । सि की ध्वनि ही है बन गई है ।
अस्मिन से ही हम और हमें शब्द बने लगते हैं । संस्कृत शब्दों के सैंकड़ों तद्भव
रूप हिन्दी में और दूसरी भाषाओं में चल रहे हैं और संस्कृत के अनेक तत्सम शब्द
अनेक भारतीय भाषाओं में मिलते हैं ।
हिन्दी में अधिकांश संस्कृत शब्दों को अपना लिया गया पर उस में संस्कृत , फ़ारसी
, अरबी , तुर्की और अंग़ेज़ी के अनेक शब्दों के तद्भव रूप भी मिलते हैं । अनेक उप
भाषाओं , बोलियों के प़चलित शब्द भी हिन्दी में मिलते हैं । ब़ज भाषा , अवधी ,
भोजपुरी , मैथिली , मगही , सन्थाली , राजस्थानी और पहाड़ी बोलियों के शब्द भी
हिन्दी में आ कर घुलमिल गये हैं । बोलियों से हिन्दी में मिश्रण का क़म निरन्तर जारी
है । अन्य भाषाओं और बोलियों से शब्द लेने की यह प़वृत्ति अन्य भारतीय भाषाओं
में भी मिलती है ।

भारतीय भाषाओं में अनेक समान शब्दों को लेने के पीछे मुख्य कारण भारतीय संस्कृति की
एकता है पर इस के साथ अन्य कारण भी हैं जैसे समान ऐतिहासिक घटनाओं के प्रभव
समान भौगोलिक परिवेश और रितुओं का समान क्रम भी हैं । भारतीय संस्कृति के समान तत्त्व
अनेक भारतीय भाषाओं और उन के साहित्य में झलक जाते हैं । ा
संस्कृति का एक अनिवार्य तत्व धर्म है । आर्य धर्म , जो कालान्तर में हिन्दू धर्म कहा जाने
लगा , लगभग सभी भारतीय भाषाओं और उन के साहित्य को प्रभावित करता रहा है । इस
धर्म की व्यंजना सीधे सीधे धर्म प्रचार के रूप में नहीं हुई बल्कि आस्तिकता , आध्यात्मिकता ,
और भक्ति भावना के आग्रह के रूपों में हुई । चाहे निराकर ईश्वर की भक्ति हो या साकार
ईश्वर के विभिन्न अवतारों की , पर भक्ति की चेतना सभी भारतीय भाषाओं के साहित्यों में
मिलती है ।

डा सुधेश
३१४ सरल अपार्टमैन्ट्स , द्वारिका , सैक्टर १०
दिल्ली ११००७५
फ़ोन 9350974120

मेरी ताज़ा कविता

मेरी ताज़ा कविता

भाग्य और नियति

मैं भाग्यवादी नहीं
पर मेरे साथ
जो अघटित घटा
या घट रहा है या घटेगा
है मेरी नियति ।
भाग्य तो धोखा है
हसीन ख़्वाब सा
जिसे देखते देखते
कई बचपन बुढ़ा गये
फिर भी अन्धी आँखों में है
आशा की ज्योति ।
घटित और अघटित के बीच
जीवन बीत रहा
घड़ी के पैन्डुलम सा ।

— सुधेश

श्रेणी   Kavita ,  Sudhesh ,  bhagya

स्मृति शेष डा शैलेन्द्र त्रिपाठी

श्रेणी   संस्मरण — शैलेन्द्र त्रिपाठी  — शान्ति निकेतन
स्मृति शेष डा शैलेन्द्र कुमार त्रिपाठी

शान्ति निकेतन के विश्वभारती विश्व विद्यालय के हिन्दी भवन में हिन्दी के प्रोफ़ेसर और विभागाध्यक्ष
डा शैलेन्द्र त्रिपाठी का निधन २७ जनवरी २०१५ को गोरखपुर में हो गया । यह दुखद समाचार पा कर
मेरा दुखी होना स्वाभाविक था , क्योंकि वे मेरे अच्छे मित्र थे । वे विगत एक वर्ष से रक्त कैन्सर से
पीड़ित थे । इलाज के बावजूद उन को बचाया नहीं जा सका । अब क्या किया जा सकता है उन्हें
श्रद्धांजलि देने के सिवा और उन की यादों में खो जाने के सिवा ।
उन से मेरा परिचय लगभग एक दशक पहले उन के द्वारा सम्पादित त्रैमासिक पत्रिका सरयू धारा
के माध्यम से हुआ । न जाने कैसे सरयू धारा का कोई अंक मेरे हाथ लग गया । उस में अन्य सामग्री
के साथ कविताएँ प्रचुर मात्रा में थीं और कुछ श्रेष्ठ कविताएँ थीं । मुझे लगा कि कविता को हाशिये
पर धकेले जाने के युग में बंगाल से एक पत्रिका निकल रही है जो मुझे कविता प्रधान लगी । मैं ने
अपनी कुछ कविताएँ उन्हें भेज दीं , जो अगले अंक में सम्पादक की टिप्पणी के साथ छपीं । फिर
त्रिपाठी जी से पत्राचार का सिलसिला शुरु होगया ।
एक पत्र में उन्होंने लिखा कि वे लोक साहित्य पर विशेषांक निकालना चाहते हैं और उस के
लिए मैं कोई लेख भेजूँ । उन दिनों मैं कुल्लियाते नज़ीर अकबराबादी , जो उर्दू लिपि में है, पढ़ रहा
था । सोचा कि नज़ीर की कविता में लोकतत्त्व या लोकचेतना पर लिखूँ । मैं ने नज़ीर पर वह लेख
लिख कर उन्हें भेज दिया । एक दो महीनों के बाद त्रिपाठी जी का टेलीफ़ोन आया । उन्होंने कहा
कि लोकसाहित्य पर सामग्री पर्याप्त मात्रा में एकत्र नहीं हो पाई , लोकसाहित्य विशेषांक बाद
में निकालेंगे अगला अंक प्रेमचन्द पर होगा , जिस के लिए काफी सामग्री उन के पास आ गई
है । उन का सुझाव था कि मैं प्रेम चन्द के किसी पक्ष पर एक लेख उन्हें भेज दूँ । मैं ने गोदान को
दूसरी या तीसरी बार पढ़ा और उस में दलित चेतना की खोज की । दलित लेखक प्रेम चन्द को
अपना लेखक नहीं मानते लेकिन मैं ने गोदान में दलित पात्र और दलित चेतना को पाया । अन्ततः:
गोदान में दलित चेतना शीर्षक एक लेख लिख कर त्रिपाठी जी को भेज दिया । वह विशेषाँक
मेरे लेख के साथ छपा जिस में अनेक आलोचकों के लेख भी थे । लगभग दो सौ या ढाई सौ
पृष्ठों का विशेषांक निकालना आसान नहीं था ।
सन २००७ के किसी महीने उन का फ़ोन आया कि विश्वभारती से मुझे कोई पत्र
मिला होगा , जिस के द्वारा आप को यहाँ मेरे शिष्य दुष्यन्त कुमार की मौखिक परीक्षा के लिए
बुलाया गया है । शीघ्र अपनी स्वीकृति भेजिये । मैं उस शोधप्रबन्ध पर अपनी रिपोर्ट पहले भेज
चुका था और उन का फ़ोन सुन कर मैं ने मौखिक परीक्षा के लिए अपनी स्वीकृति भी भेज दी ।
औपचारिकताओं के बाद मैं मार्च २००७ के अन्तिम सप्ताह में दिल्ली से कोलकाता के लिए
एयर सहारा के विमान से सवेरे वहां के हवाई अड्डे पर उतरा । मेरी हवाई यात्रा का प्रबन्ध त्रिपाठी
जी के प्रयत्न से हो गया था । हावड़ा के रेलवे स्टेशन से एक एक्सप्रेस गाड़ी ले कर मैं शाम को
लगभग साढ़े छह बजे के लगभग बोलपुर स्टेशन पर उतरा ।विचित्र लगा कि स्टेशन का नाम
बोलपुर है शान्ति निकेतन क्यों नहीं लेकिन तब बोलपुर ही था ।स्टेशन पर गाड़ी से उतरते ही
लाउडस्पीकर पर घोषणा सुनी कि डा सुधेश अमुक जगह पर आ जाएँ जहाँ आप को दुष्यन्त
मिलेंगे । मैं उन के साथ रिक्शा द्वारा विश्वभारती के अतिथि गृह में पहुँचा ,जहाँ दुष्यन्त और
उन के मित्र अनिल कुमार सिंह मुझे सीधे कैन्टीन में ले गये जहाँ चायपान के बाद वे चले गये
और यह कह कह गये आप के रात के भोजन का प्रबन्ध भी इसी कैन्टीन में है ।

अगले दिन सवेरे त्रिपाठी जी कैन्टीन में आए । तब उन से मेरी पहली भेंट हुई । नाश्ते के
बाद वे मुझे पहले अपने आवास पर ले गये , जो हिन्दी भवन के पास ही है । बातचीत में पता
चला कि वे उसी आवास में रहते हैं जहाँ कभी हज़ारी प्रसाद द्विवेदी रहते थे । आवास के पीछे
एक बग़ीचा है , जिसमें अनेक फूल वाले पौधों के साथ एक अशोक वृक्ष भी है , जिस पर
लाल फूल आते हैं । यह वही अशोक वृक्ष है जिस के लाल फूलों पर मुग्ध हो कर द्विवेदी जी ने
अशोक के फूल नामक प्रसिद्ध निबन्ध लिखा था । द्विवेदी जी का लगाया एक नीम का पेड
भी त्रिपाठी जी ने मुझे दिखाया ।
पता चला कि द्विवेदी जी पर जब कोई वृत्तचित्र दिल्ली के एन सी आर टी द्वारा बनाया जा
रहा था , तो प्रोड्यूसर और कैमरा टीम के साथ उन के पुत्र मुकुन्द द्विवेदी भी उस घर को
फ़िल्माने आये थे , जिस में तब शैलेन्द्र जी रह रहे थे । मैं ने उन से चुटकी ली कि आप एक
ऐतिहासिक घर मे हैं , जहाँ हज़ारी प्रसाद जी की स्मृतियाँ बसी हुई हैं । शैलेन्द्र जी का उत्तर था
तो मैं भी एक ऐतिहासिक व्यक्ति हूँ। तब बात हँसी में उड गई थी , पर अब तो सचमुच वे इतिहास की
वस्तु होगये हैं , जब उन के मित्र और प्रशंसक उन के दुखद वर्तमान के साथ उन के प्रकाशमान
इतिहास की भी खोज करेंगे ।
कुछ देर बाद शैलेन्द्र जी मुझे डिप्टी रजिस्ट्रार के दफ़्तर में ले गये , जहाँ कुछ काग़ज़ों पर
मेर हस्ताक्षर लिये गये। औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद हम दोनों उस कमरे में गये जो
मौखिक परीक्षा के लिए था । शोधार्थी दुष्यन्त कुमार वहाँ पहले से बैठे थे। मैं ने उन से जो प्रश्न
पूछे उन के उत्तर सन्तोषजनक थे , जिन से मुझे लगा कि वे अपने विषय में पारंगत हैं । उन्होंने
गोविन्द मिश्र की कहानियों पर अपना शोधप्रबन्ध लिखा था ।
उस दिन दोपहर के भोजन के लिए दुष्यन्त बोलपुर के एक होटल रसना में ले गए । उन
से मित्र अनिल सिंह भी वहाँ आए । हम तीनों ने वहाँ शाकाहारी भोजन किया। उस के बाद
दुष्यन्त जी ने मुझे अपनी मोटर साइकिल द्वारा अतिथि गृह में छोड़ा ।
लगभग चार बजे वे दोनों मित्र फिर वहाँ आये और मुझे उत्तरायण , संगीत भवन
और कलाभवन दिखाने के लिए ले गये । उस दिन मुझे विश्वभारती के परिसर में घूमने का
अवसर मिला । । वहाँ विश्वविद्यालय के विभाग को भवन कहा जाता है ,जैसे हिन्दी भवन ,
कला भवन , अंग्रेज़ी भवन , इतिहास भवन आदि । कला भवन बड़ा रोचक औकलात्मक लगा ।
अनेक मूर्तियाँ , और कलात्मक दृश्य मेरे सामने थे । एक वृक्ष की उलझी हुई डालियों को इस
तरह जोड़ा गया था कि उस में कोई आकृति झांकनें लगी थी । एक किनारे पर विशाल पत्थर
को इस तरह तराशा गया था कि उस में डाँडी में नमक सत्याग्रह के लिए मार्च करते महात्मा
गांधी की प्रतिमा नज़र आती है । इस प्रकार की आकृतियाँ वहाँ के वातावरण को कलात्मक
बना रही हैं । शान्तिनिकेतन की यात्रा पर मैं ने दिल्ली लौट कर एक लेख लिखा था , जो
दिल्ली की पत्रिका साहित्य अमृत में छपा । वही लेख महाराष्ट्र के शिक्षा विभाग द्वारा
संचालित स्कूल बोर्ड की आठवीं कक्षा के हिन्दी के पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया ।
उस की रायल्टी मुझे कई वर्षों तक मिलती रही । इस का श्रेय मैं शैलेन्द्र त्रिपाठी जी को देता
हूँ , क्योकि उन्हीं के कारण मेरी वहाँ की यात्रा हुई थी ।

उस दिन रात को त्रिपाठी जी मुझे भोजन के लिए अपने आवास पर ले गये । उन से खूब बातें
हुईं। पता चला कि वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय मे पढ़े थे और वहीं से उन्होंने डीफिल उपाधि प्राप्त
की थी । वे जगदीश गुप्त और सत्य प्रकाश मिश्र के शिष्य रहे । वहाँ की छात्र राजनीति में भी वे
सक्रिय रहे । तब वे वाम पन्थी थे पर बाद में वाम पन्थियों से उन का मोह भंग हो गया । किस कारण
उन का वाम पन्थियों से मोह भंग हुआ , यह उन्हों ने नहीं बताया । इस विषय में उन्हें कुरेदना मैं ने ्त
उचित नहीं समझा । हां मुझे यह आभास अवश्य हुआ कि त्रिपाठी जी एक चिन्तन शील और सक्रिय
व्यक्ति थे ।
उन्हों ने बताया कि शान्तिनिकेतन में उन की नियुक्ति तत्कालीन विभागाध्यक्ष सिया राम
तिवारी की इच्छा के विरुद्ध हो गई थी । उन्हों ने कई प्रसंग सुनाये जिन से यह प्रकट होता है कि
वे तिवारी जी की विद्वत्ता के प्रति आश्वस्त नहीं थे । फिर भी तिवारी जी की अध्यक्षता के काल
में उन्हों ने तिवारी जी को अपना पूर्ण सहयोग दिया । इस से प्रकट होता है कि त्रिपाठी जी झगड़ालू क़िस्म के व्यक्ति नहीं थे । वे अध्ययनशील व्यक्ति थे और अपने कर्तव्य के प्रति सचेत थे ।
त्रिपाठी जी ने शान्तिनिकेतन में रहते हुए स्वाध्याय से बंगला सीखी और उस में इतना
कौशल प्राप्त कर लिया कि बंगला से हिन्दी में अनुवाद करने लगे । वे हिन्दी और भोजपुरी में कविताएं
लिखते थे और हिन्दी का एक त्रैमासिक सरयू धारा नाम से कई वर्षों तक सम्पादित एवम् प्रकाशित
करते रहे । यह उन की सृजनशीलता और कर्मठता का परिचायक है ।
उन की बातों से मुझे लगा कि वे शान्ति निकेतन से सन्तुष्ट नहीं हैं और वाराणसी के हिन्दू
विश्वविद्यालय मे प्रोफ़ेसर हो कर जाना चाहते हैं । उन की असन्तुष्टि के कारण का मुझे पता
नहीं चला पर अनुमान कर सकता हूं कि शायद उन्हें लगता था कि वहां उन की पदोन्नति नहीं
हो सकेगी । अगले दिन शान्तिनिकेतन से मैं रेलगाड़ी द्वारा कोलकाता गया जहाँ दो दिनों तक रुकने के बाद दिल्ली लौट आया ।
शैलेन्द्र जी ने विश्वभारती विश्वविद्यालय से मेरे पास एक दूसरा शोधप्रबन्ध भिजवाया ,
जो मोती बीए के भोजपुरी साहित्य को योगदान पर केन्द्रित था । मैं ने उसे जांच कर उस पर अपनी
रिपोर्ट समयानुसार विश्वविद्यालय को भेज दी । कुछ समय बाद त्रिपाठी जी ने फ़ोन पर कहा
कि दूसरे शोधार्थी की मौखिक परीक्षा के लिए यदि आप को बुलाया जाए तो अपनी स्वीकृति
भेज दीजियेगा । संयोग ऐसा हुआ कि मुझे नहीं बुलाया गया , अन्यथा शान्तिनिकेतन की
दूसरी यात्रा हो जाती

शैलेन्द्र जी से मेरी दूसरी भेंट ओडिसा के ब्रह्मपुर नगर में २०जून सन २००७ में हुई ,जहाँ
के विश्वविद्यालय में वे मेरी एक शिष्या निवेदिता साहू की मौखिक परीक्षा लेने गये थे और मैं
दिल्ली सेब्रह्मपुर गया था । मैं ब्रह्म पुर के भुवनेश्वरी लाज में ठहरा था । उस दिन मेरी शिष्या निवेदिता साहू मुझे होटल में नाश्ता करा के शैलेन्द्र त्रिपाठी की अगवानी के लिए स्टेशन चली गई।
उन्हों ने वहाँ के विश्वविद्यालय के कार्यालय में जा कर निवेदिताकी मौखिक परीक्षा ली ।
उस दिन एक होटल में भोजनकरते हुए त्रिपाठी जी से अनेक विषयों पर बात हुई । उन्हों मे बताया
कि विदिशा ( म प्र ) के राम कृष्ण प्रकाशन ने उन की कई पुस्तकें छपी हैं । वे बंगला से हिन्दी में
किये गये अपने अनुवाद छपवाना चाहते थे । उन के बाबा एक स्वतन्त्रता सेनानी थे , जिन के अनेक संस्मरण त्रिपाठी जी ने लिखे थे । उन्हें वे पुस्तक रूप में छपवाना चाहते थे ।
वे कहने लगे कि अपनी कुछ कविताएँ भेजिये । वे सरयू धारा का कविता विशेषाँक निकालना
चाहते थे । उन्होंने उस का कहानी विशेषांक भी निकाला था । वे स्वयम् हिन्दी और भोजपुरी में

कविताएँ लिखते थे । उन की कुछ हिन्दी और भोजपुरी कविताएँ मैं ने फेसबुक पर देखी हैं । कह
नहीं सकता कि उन की कविताओं का संकलन प्रकाशित हुआ या नहीं । पर उन के पास कईयोजनाएँ
थी । एक योजना थी सरयू धारा का लोकसाहित्य विशेषांक निकालना , जिस के लिए मैं ने उन्हें नज़ीर अकबराबादी की शायरी में लोक तत्व विषय पर एक लेख भेजा था ।
उन्हें उसी दिन शाम की गाड़ी से कोलकाता लौटना था । वे स्टेशन जाने की तैयारी करने
लगे। मै ने उन्हें अपनी दो पुस्तकें भेंट कीं और शान्तिनिकेतन के पुस्तकालय के लिए भेंट स्वरूप
अपनी सात पुस्तकें दीं । उसी दिन किसी गाड़ी से वे ब्र्ह्मपुर से कोलकाता वापस चले गये । मैं
दिल्ली लौट आया । उस दिन क्या पता था कि वह मेरी उन से अन्तिम भेंट होगी ।
— डा सुधेश
३१४ सरल अपार्टमैन्ट्स , द्वारिका , सैक्टर १० दिल्ली ११००७५
फ़ोन ०९३५०९७५१२०

ख़ुशबू बाँटो

हिन्दी हाइकु(HINDI HAIKU)-'हाइकु कविताओं की वेब पत्रिका'-2010 से प्रकाशित हो रही है। आपकी हाइकु कविताओं का स्वागत है !

डॉ सुधेशडा.सुधेश

1

प्यार अब है

सजी बैठक बीच

काग़ज़ी फूल ।

2

अध्यापक है

एक घिसा रिकार्ड,

जो अनसुना ।

3

कली खिली क्या !

भँवरे रसलोभी

पगलाए हैं ।

4

सुख के साथी

प़कट शत्रु पर

न्यौछावर हैं ।

5

चिकने मुखड़े

पल भर के सुख

जी के दुखड़े ।

6

आँख बाज़ की

झपट चील की तो,

कौन बचेगा?

7

जितने ऊँचे,

उतने ही वीराने

खड़े ताड़ ये ।

8

कैसा युग है !

गधे निकल भागे,

घोड़ों से आगे ।

9

कैसे बादल

चोटी पर बरसे

मरु हैं प्यासे ।

10

नई कोंपलें

शीश उठा कहतीं-

‘नित्य खिलना।’

11

खिले सुमन

झर -झर कहते-

‘ख़ुशबू बाँटो।’  

12

सूखा पत्ता भी

कुचले जाने पर,

शोर मचाता ।

13

नव कलियाँ

झर झर कहती

कौन अमर ।

14

 नभ के तारे

रूप देखती मानो

मेरी दो आँखें ।

-0-

View original post 274 और  शब्द

मन तो जवान है

मन तो जवान है ।

तन कुछ वयोवृद्ध है
कुछ काल क्रुद्ध है
परवाह नहीं है कुछ
मेरा मन तो जवान है ।
आँखों की ज्योति मन्द
न रहा पढ़ने का आनन्द
अग जग को पढ़ता जो
मेरा मन तो जवान है ।
कान सुनते हैं कम
न रहा निन्दा का ग़म
फ़िल्मी गीतों से वंचित
मेरा मन तो जवान है ।
दाँत कुछ टूटे घिस कर
फिर भी खाता हूँ छक कर
नक़ली दाँतों से हँसता
मेरा मन तो जवान है ।
टाँग में ठहरी पीड़ा
छूट गई है क्रीड़ा
हाथ जब तक लिखता
मेरा मन तो जवान है ।
रीढ़ हड्डी थी सीधी
कमबख़्त हुई क्यों टेढ़ी
वक्र है चोटी से एड़ी
मेरा मन तो जान है ।
बूढ़ा होता है तन
नित नूतन है मन
इसी लिए तो कहता
मेरा मन तो जवान है ।
नए विचारों का संग है
जग मुझ से कुछ तंग है
जवानों की संगति में
मेरा मन तो जवान है ।
कहो जवानी की जय
न मानो कभी पराजय
उम्र सफ़र जारी है
मेरा मन तो जवान है ।
— सुधेश

मेरी कविताएँ

राही अजानी राह का

राही अजानी राह का हूँ
चलना काम मेरा
घुप अंधेरी गुफ़ा में विश्राम कर
चल पड़ा था टेढ़े रास्तों पर
अंधे मोड़ से अंधे मोड़ तक
हर मोड़ पर मिले हमदर्द
कटारी आँख ख़ंजर हाथ वाले
हंस कर लूटते हैं स्वत्व
एक ने तो पेट पर ही लात मारी
चारों ख़ाने चित्त मैं
तारे दिखे दिन में
स्वप्न चकनाचूर
उन की किरच चुभती अभी तक आँख में
दधीची हड्डियाँ विरासत में मिली थीं
उठ कर चल दिया फिर वज़ का निर्माण करने ।

मंज़िल का निशाँ ग़ायब
पर राह वेश्या की तरह फैली पड़ी
उठा मस्तक राजपथ पर आगया
सिंहासन दिखा ख़ाली
बढ़ा उस की ओर
मगर उस पर धरा बौना
बैसाखी की कृपा से
बैसाखी संभाले थे
चोर ठग मक्कार पूरे चार
पराजित कर्ण सा मैं चल दिया
जीतने महाभारत नया ।

माँ की याद

मेरे खुरदुरे माथे पर
अंकित हैं कई कई दु:ख
पर माँ की ममता की बदली के नीचे
ओझल था पहाड़ सा दु:ख ।
माँ
एक शब्द नहीं
महाकाव्य है
ममता व्यथा समर्पण का
जिसे सुनता रहा अनेक अनेक वर्षों तक
अब भी उस का स्वर
गूँजता है कानों में ।
अब मेरा माथा
दु:खों की चोट से
और खुरदुरा हो गया है
उम़ की सलवटों ने
कर दिया उसे बदरंग
पर अब भी
माँ की याद आने पर
आँखों में उतर आता है सावन ।

माँ की मौत

माँ की मौत
ख़बर नहीं अख़्बार की
जो सुन कर बासी हो जाए
पढ़ कर फेंक दी जाए ।
माँ की मौत
एक चीख़ है
दिल की घाटियों की गूँज
रात के सन्नाटे में ,
एक टीस है
भीतर कहीं से उठ कर
धमनियों में ख़ून के साथ बहती है
मनहूस उदास एकान्त में ।
माँ की मौत है
ममता का अकाल
ज़िन्दगी के एहसास में कमी
विश्वास को गहरी ठेस
भरी पूरी दुनिया का शून्य
भीड़ में अकेलेपन की चोट ।
काश ! मैं यह सब समझता
माँ के रहते ।

डा सुधेश

अपने घरों में बेघर हुए जो

तीर्थ यात्री लौटे घरों को
अपने घरों में बेघर हुए जो
कहाँ जाएँ ?
संवेदना के शब्द सारे चुक गये
हमदर्दी के ग़ुब्बारे फटे
उन की वेदना के सिन्धु की गहराई अतल
आँसू नदी के रेत से सूखे
आकाश छत नीचे
उपल के बिस्तरे पर
खुली आँखों
देखते हैं स्वप्न उजड़े घरों के ।
पहाड़ी बाढ़ में बह गये घर द्वार
छोटे बड़े बाज़ार
हर तरफ़ शवों के अम्बार
जीवित शिव पलों में शव हो गये ।
पर्वतों के बीच में की ज़िन्दगी
पर्वत से न कम थी सख़्त
अब प़लय की त्रासदी ने
पर्वतों के देवताओं को शरणार्थी बनाया
राहत केन्द़ में लाइन में खड़े हैं ।
स्वर्ग धरती के
नरक में हो गये परिणत
पावन तीर्थ भी मानो अपावन
देखते बस रह गये भगवान
उन के भक्त सिन्धु आँखों में लिये ।
किस के पाप का परिणाम है यह महा प़लय ?
प़गति की दौड़ में अन्धे बने
मनुज की लालसा ने
प़कृति को नटी सी नचाया
त्रासदी के मंच पर
त्रासद अन्त पाया ।

ख़ुशी के आँसू

दु:ख में आँसू निकलते हैं
आँसू और दु:ख का रिश्ता
मैं ने स्वयम् भोगा है
कँटीली ज़िन्दगी की राह में जब
किसी ने छुई दुखती नब्ज़
नयन आकाश में घुमड़ने लगे बादल
मन की धरा गीली
युग के ताप में क्या कमी आई ?
लेकिन ख़ुशी के आँसू
देखे पिता की आँख में
मेरे पास होने की ख़बर
लघु सफलता की ख़बर कोई
जब उन्हें छू कर गई
बूढ़ी आँख में सावनी बरसात उतरी ।
आँसू दु:ख की सन्तान
पर ख़ुशी के भी सगे भाई ।

 

शताब्दी किस ने देखी है

हर दिन शुरु होता है
सुबह की ताज़गी
गुनगुनी धूप से
रोटी के राग के साथ
बीत जाता है
उदास शाम के धुँधलके में ।
दिन बदलता है सप्ताह में
जो शुरु होता है
नए संकल्प के साथ
हर काम लेकिन टलता है
अगले सप्ताह के लिए ।
देखते देखते
सप्ताह बदल जाता है महीने में
जो शुरु होता है नए जोश के साथ
ख़त्म होता है
रोज़ कम होने वाले मासिक वेतन सा ।
बारह महीनों बाद
आता है नया वर्ष
जो शुरु होता है ढेरों बधाइयों
नई योजनाओं के साथ
जो रह जाती बन पंचवर्षीय योजना
सिर्फ काग़ज़ पर ।
वर्षों बाद
शताब्दी किस ने देखी है
बस आदमी रोज़ जीता है
रात को मरता है ।

_ सुधेश
३१४ सरल अपार्टमैन्ट्स , द्वारिका , सैैक्टर १० , नई दिल्ली ११००७५
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