मन तो जवान है

मन तो जवान है ।

तन कुछ वयोवृद्ध है
कुछ काल क्रुद्ध है
परवाह नहीं है कुछ
मेरा मन तो जवान है ।
आँखों की ज्योति मन्द
न रहा पढ़ने का आनन्द
अग जग को पढ़ता जो
मेरा मन तो जवान है ।
कान सुनते हैं कम
न रहा निन्दा का ग़म
फ़िल्मी गीतों से वंचित
मेरा मन तो जवान है ।
दाँत कुछ टूटे घिस कर
फिर भी खाता हूँ छक कर
नक़ली दाँतों से हँसता
मेरा मन तो जवान है ।
टाँग में ठहरी पीड़ा
छूट गई है क्रीड़ा
हाथ जब तक लिखता
मेरा मन तो जवान है ।
रीढ़ हड्डी थी सीधी
कमबख़्त हुई क्यों टेढ़ी
वक्र है चोटी से एड़ी
मेरा मन तो जान है ।
बूढ़ा होता है तन
नित नूतन है मन
इसी लिए तो कहता
मेरा मन तो जवान है ।
नए विचारों का संग है
जग मुझ से कुछ तंग है
जवानों की संगति में
मेरा मन तो जवान है ।
कहो जवानी की जय
न मानो कभी पराजय
उम्र सफ़र जारी है
मेरा मन तो जवान है ।
— सुधेश

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मेरी कविताएँ

राही अजानी राह का

राही अजानी राह का हूँ
चलना काम मेरा
घुप अंधेरी गुफ़ा में विश्राम कर
चल पड़ा था टेढ़े रास्तों पर
अंधे मोड़ से अंधे मोड़ तक
हर मोड़ पर मिले हमदर्द
कटारी आँख ख़ंजर हाथ वाले
हंस कर लूटते हैं स्वत्व
एक ने तो पेट पर ही लात मारी
चारों ख़ाने चित्त मैं
तारे दिखे दिन में
स्वप्न चकनाचूर
उन की किरच चुभती अभी तक आँख में
दधीची हड्डियाँ विरासत में मिली थीं
उठ कर चल दिया फिर वज़ का निर्माण करने ।

मंज़िल का निशाँ ग़ायब
पर राह वेश्या की तरह फैली पड़ी
उठा मस्तक राजपथ पर आगया
सिंहासन दिखा ख़ाली
बढ़ा उस की ओर
मगर उस पर धरा बौना
बैसाखी की कृपा से
बैसाखी संभाले थे
चोर ठग मक्कार पूरे चार
पराजित कर्ण सा मैं चल दिया
जीतने महाभारत नया ।

माँ की याद

मेरे खुरदुरे माथे पर
अंकित हैं कई कई दु:ख
पर माँ की ममता की बदली के नीचे
ओझल था पहाड़ सा दु:ख ।
माँ
एक शब्द नहीं
महाकाव्य है
ममता व्यथा समर्पण का
जिसे सुनता रहा अनेक अनेक वर्षों तक
अब भी उस का स्वर
गूँजता है कानों में ।
अब मेरा माथा
दु:खों की चोट से
और खुरदुरा हो गया है
उम़ की सलवटों ने
कर दिया उसे बदरंग
पर अब भी
माँ की याद आने पर
आँखों में उतर आता है सावन ।

माँ की मौत

माँ की मौत
ख़बर नहीं अख़्बार की
जो सुन कर बासी हो जाए
पढ़ कर फेंक दी जाए ।
माँ की मौत
एक चीख़ है
दिल की घाटियों की गूँज
रात के सन्नाटे में ,
एक टीस है
भीतर कहीं से उठ कर
धमनियों में ख़ून के साथ बहती है
मनहूस उदास एकान्त में ।
माँ की मौत है
ममता का अकाल
ज़िन्दगी के एहसास में कमी
विश्वास को गहरी ठेस
भरी पूरी दुनिया का शून्य
भीड़ में अकेलेपन की चोट ।
काश ! मैं यह सब समझता
माँ के रहते ।

डा सुधेश

अपने घरों में बेघर हुए जो

तीर्थ यात्री लौटे घरों को
अपने घरों में बेघर हुए जो
कहाँ जाएँ ?
संवेदना के शब्द सारे चुक गये
हमदर्दी के ग़ुब्बारे फटे
उन की वेदना के सिन्धु की गहराई अतल
आँसू नदी के रेत से सूखे
आकाश छत नीचे
उपल के बिस्तरे पर
खुली आँखों
देखते हैं स्वप्न उजड़े घरों के ।
पहाड़ी बाढ़ में बह गये घर द्वार
छोटे बड़े बाज़ार
हर तरफ़ शवों के अम्बार
जीवित शिव पलों में शव हो गये ।
पर्वतों के बीच में की ज़िन्दगी
पर्वत से न कम थी सख़्त
अब प़लय की त्रासदी ने
पर्वतों के देवताओं को शरणार्थी बनाया
राहत केन्द़ में लाइन में खड़े हैं ।
स्वर्ग धरती के
नरक में हो गये परिणत
पावन तीर्थ भी मानो अपावन
देखते बस रह गये भगवान
उन के भक्त सिन्धु आँखों में लिये ।
किस के पाप का परिणाम है यह महा प़लय ?
प़गति की दौड़ में अन्धे बने
मनुज की लालसा ने
प़कृति को नटी सी नचाया
त्रासदी के मंच पर
त्रासद अन्त पाया ।

ख़ुशी के आँसू

दु:ख में आँसू निकलते हैं
आँसू और दु:ख का रिश्ता
मैं ने स्वयम् भोगा है
कँटीली ज़िन्दगी की राह में जब
किसी ने छुई दुखती नब्ज़
नयन आकाश में घुमड़ने लगे बादल
मन की धरा गीली
युग के ताप में क्या कमी आई ?
लेकिन ख़ुशी के आँसू
देखे पिता की आँख में
मेरे पास होने की ख़बर
लघु सफलता की ख़बर कोई
जब उन्हें छू कर गई
बूढ़ी आँख में सावनी बरसात उतरी ।
आँसू दु:ख की सन्तान
पर ख़ुशी के भी सगे भाई ।

 

शताब्दी किस ने देखी है

हर दिन शुरु होता है
सुबह की ताज़गी
गुनगुनी धूप से
रोटी के राग के साथ
बीत जाता है
उदास शाम के धुँधलके में ।
दिन बदलता है सप्ताह में
जो शुरु होता है
नए संकल्प के साथ
हर काम लेकिन टलता है
अगले सप्ताह के लिए ।
देखते देखते
सप्ताह बदल जाता है महीने में
जो शुरु होता है नए जोश के साथ
ख़त्म होता है
रोज़ कम होने वाले मासिक वेतन सा ।
बारह महीनों बाद
आता है नया वर्ष
जो शुरु होता है ढेरों बधाइयों
नई योजनाओं के साथ
जो रह जाती बन पंचवर्षीय योजना
सिर्फ काग़ज़ पर ।
वर्षों बाद
शताब्दी किस ने देखी है
बस आदमी रोज़ जीता है
रात को मरता है ।

_ सुधेश
३१४ सरल अपार्टमैन्ट्स , द्वारिका , सैैक्टर १० , नई दिल्ली ११००७५
फ़ोन ९३५०९७४१२०

 

मेरे नए मुक्तक

 

 

मेरे नये मुक्तक

जो कुछ होना वह तो होना है
यहाँ नहीं है जो अनहोना है
अपना कर्म किये जा रे मनवा
फिर काहे क़िस्मत पर रोना है ।

क़िस्मत विस्मत कोई चीज़ नहीं है
चीज़ अगर कोई नाचीज़ नहीं है
इस के चक्कर में पड़े रहोगे तो
झोली में फिर कोई चीज़ नहीं है ।

चाहे तुम तेल निकालो पानी से
वरदान नहीं माँगो अभिमानी से
या तो छीनो अथवा चुप हो बैठो
यहाँ नहीं कुछ मिलता आसानी से ।

चन्दन खिल कर ही चन्दन होता है
हो वन्दनीय फिर वन्दन होता है
जीवन का ताप तपो तापस पहले
सोना तप कर ही कुन्दन होता है ।

जो भी कुछ हो अपनी मर्ज़ी से हो
प्यार मुहब्बत या ख़ुदगर्ज़ी से हो
फूल े फूले क्योंं फिरते हो प्यारे
जो हो कपड़े से या दर्ज़ी से हो ।

रहा बुलाता पुस्तक मेला
देख न पाया मेला ठेला
झुकी कमर सीधी करने में
छूट गया बस पुस्तक मेला ।।

इतने मेरे साथ झमेले
सारे दुख हँस हँस कर झेले
झुकी कमर फिर पाँव न चलता
कैसे जाता पुस्तक मेले ।

कोई मुझे साथ में ले ले
भीड़ भाड़ मे फँसा अकेले
पुस्तकें बुलाती है मुझ को
जाऊँगा फिर पुस्तक मेले ।

पुस्तक दर्शन से सुख मिलता
चाहे उस का दाम न झिलता
ऐसा लगता अक्सर मुझ को
पुस्तक पढ़ लेखक से मिलता ।
— सुधेश

गंगा तथा अन्य कविताएँ

गंगा तथा अन्य कविताएँ

गंगा

उसे बहते हो गईं सैंकड़ों सदी है
बहे जिस में सभी पुण्य सारी बदी है
जीवनदायिनी जो है भारतभूमि हित
गंगा नदी का नाम न केवल नदी है ।
इस के किनारे पले कितने शहर ग़ाम
बसे कितने तीर्थ हैं कितने पुण्य धाम
चिता की राख पड़ती है गंगा घाट पर
आत्माएँ पहुँचती यहीं से स्वर्ग धाम ।
कोई धनी हो या रंक हो नंगा
गंगा में नहा कर मन हुआ चंगा
हम अभागे रख न पाए इसे शुद्ध
सब के पाप धोती जा रही गंगा ।
ग़रीबों के लिए कठौती में बसी गंगा
करोड़ों हित स्वर्ग की नसैनी यही गंगा
पुण्यजल में स्नान करने चले आते सदा
करोड़ों जनों की आस्था का केन्द गंगा ।

पिता

जीवन पिता ने दिया जीवन पिता का
तन पिता की देन है यह मन पिता का
हम पिता का दिन मनाएँ कृतज्ञता से
एक दिन ही नहीं हर दिन पिता का ।

हिमालय सामने शीश यह झुकता नहीं
पिता के सामने मूर्ख ही झुकता नहीं
ज़िन्दगी के क़र्ज तो चुकाने पड़ेंगे
क़र्ज माता पिता का कभी चुकता नहीं ।

माँ की याद

मेरे खुरदुरे माथे पर
अंकित हैं कई कई दु:ख
पर माँ की ममता की बदली के नीचे
ओझल था पहाड़ सा दु:ख ।
माँ
एक शब्द नहीं
महाकाव्य है
ममता व्यथा समर्पण का
जिसे सुनता रहा अनेक अनेक वर्षों तक
अब भी उस का स्वर
गूँजता है कानों में ।
अब मेरा माथा
दु:खों की चोट से
और खुरदुरा हो गया है
उम़ की सलवटों ने
कर दिया उसे बदरंग
पर अब भी
माँ की याद आने पर
आँखों में उतर आता है सावन ।

माँ की मौत

माँ की मौत
ख़बर नहीं अख़्बार की
जो सुन कर बासी हो जाए
पढ़ कर फेंक दी जाए ।
माँ की मौत
एक चीख़ है
दिल की घाटियों की गूँज
रात के सन्नाटे में ,
एक टीस है
भीतर कहीं से उठ कर
धमनियों में ख़ून के साथ बहती है
मनहूस उदास एकान्त में ।
माँ की मौत है
ममता का अकाल
ज़िन्दगी के एहसास में कमी
विश्वास को गहरी ठेस
भरी पूरी दुनिया का शून्य
भीड़ में अकेलेपन की चोट ।
काश ! मैं यह सब समझता
माँ के रहते ।

डा सुधेश
३१४ सरल अपार्टमैन्ट्स , द्वारिका , सैैक्टर १०
नई दिल्ली ११००७५
फ़ोन ०९३५०९७४ १२०

फुलवा

फुलवा

आंख खोलते ही
निकल पड़ा फुलवा
लंबी काली कठोर सड़कों पर
छाती में फूल छिपाये ,
उसके मैले कमीज के पल्ले में थी
गेंदे की पीली हँसी
जुही की कंवारी खुशबू
गुलाब की रक्तिम आभा
हरसिंगार की मस्त जवानी.

बस की बाट जोहते बाबु से पुछा
‘फूल चाहिये ?’
उत्तर पाया – ‘चल बे डेमफूल’
पास खड़ी सुन्दरी
खुद थी फूल केवड़े का गबरीला.
प्रेमी युगल
प्रेममदिरा के मद में बहका –
‘जूही कितने की ?’
फुलवा उछाहा में कोयल- सा चहका –
‘एक रुपैया’
ठिठका सुन-
‘एक चवन्नी लेगा ?”

धरती का नन्हा फूल
बेचता रहा फूल
दिन भर सडकों की फांक धूल
उसका ना बिका पर एक फूल
था नहीं कागजी या प्लास्टिक
उसका था असली टंच फूल.

आखिर फुलवा थक गया बैठ
फिर जागी जालिम भूख पेट
उठ खड़ा हुआ
चल दिया उधर
आती थी मीठी महक जिधर
ढाबे पर पूछा-
‘लोगे फूल
‘ये देखो इत्ते सारे फूल ?’
मालिक ने यों ही पूछ लिया
‘क्या लेगा इनका ?’
फुलवा ने समझा गाहक है
अब मोल बताना नाहक है
वह रुंधे गले से फूट पड़ा
तुमको क्या कहना लालाजी
इनकी कीमत इक रोटी
बस मना न करना लालाजी
इनकी कीमत इक रोटी
हाँ इक रोटी ‘.
हाँ इक रोटी .’…….।

मेरे ताज़ा दोहे

मेरे ताज़ा दोहे

राजा घर बेटा हुआ तो वह राजकुमार
बेटी जन्मी ़, चाहिये उस को राजकुमार ।
ऐसे राजकुमार अब जिन के पास न शक्ल
शक्ल छोड़िये अगर हो थोड़ी सी भी अक़्ल ।
चाँद चाहिये दिवस में इतनी ऊंची चाह
चमचे भी तैयार हैं कहें वाह जी वाह ।
पढ़ विदेश से आ गये पढ़ा न एको पाठ
मगर देखते ही बने उन के ठाठम ठाठ ।
एक योग्यता बस यही वे रानी के लाल
राजनीति के घाघ को कर दें चट्ट हलाल ।
दलदल धनबल साथ लें जिधर चलें जयकार
जनता सड़कों पर खड़ी करती हाहाकार ।
भैया यह जनतन्त्र है धनवालों का खेल
तन्त्र शेष पर जन कहाँ उस की छूटी रेल ।
उस का कुछ बिगड़े नहीं गिनो गिनाओ खोट
भ़ष्टाचारी हो बड़ा दिलवाएगा वोट ।
गधे पंजीरी खा रहे क्यों कलपावै जीव
दाल भात को खाय कर ठण्डा पानी पीव ।
अपना ही तो राज है चले गये अंगरेज़
ये देसी अंगरेज़ पर उन से निकले तेज़ ।
नौकरशाही मस्त है बस अंगरेज़ी बोल
चाहे कितना पीट ले तू हिन्दी का ढोल ।

कुछ पहले दोहे

कल कल करते कल गया कल पाई क्या आज
कल जितना बेकल रहा उतना बेकल आज ।
कलि युग क्या कल युग यही पल पल विकल ज़हान
कल कल करते दिन गया अविकल विकल विहान ।
कल युग पटरी पर सदा दौड़ी जीवन रेल
हंस लो मिल रोओ बिछुड़ कुछ घंटों का ंखेल ।
यह बौना गोरखपुरी यह बलिया का जाट
सब हिन्दी को चर रहे क्या बांभन क्या जाट ।
यह चाचा गोरखपुरी यह बनारसी बाप
संसद में इंग्लिश बकै बाहर हिन्दी जाप ।
दिल्ली या परदेश में हिन्दी की जय बोल
गंगा जल में पर कभी लेता व्हिस्की घोल । ।
जीवन ख़ाली कुम्भ सा सूखा सारा नीर
जर्जर डाली पर िटका सूखा पात शरीर ।
यौवन मद में मस्त हो जर्जर ज़रा न भूल
ज़रा पवन आ एक दिन झाड़ेगा सब धूल ।
अपनी सुषमा गन्ध पर चाहे जितना फूल
माली आ ले जाएगा खिले ंअधखिले फूल ।
रात गई दिन आ गया दिन बीता फिर शाम
कोल्हू में चलता रहा पहुँचा किसी न धाम ।
–सुधेश
३१४ सरल अपार्टमैैंट्स , द्वारिका सैैक्टर १० नई दिल्ली ११००७५ फ़ोन ०९३५०९७४१२० ई मेल drsudhesh@gmail.com

कुछ नई कविताएँ

अपने घरों में बेघर हुए जो

तीर्थ यात्री लौटे घरों को
अपने घरों में बेघर हुए जो
कहाँ जाएँ ?
संवेदना के शब्द सारे चुक गये
हमदर्दी के ग़ुब्बारे फटे
उन की वेदना के सिन्धु की गहराई अतल
आँसू नदी के रेत से सूखे
आकाश छत नीचे
उपल के बिस्तरे पर
खुली आँखों
देखते हैं स्वप्न उजड़े घरों के ।
पहाड़ी बाढ़ में बह गये घर द्वार
छोटे बड़े बाज़ार
हर तरफ़ शवों के अम्बार
जीवित शिव पलों में शव हो गये ।
पर्वतों के बीच में की ज़िन्दगी
पर्वत से न कम थी सख़्त
अब प़लय की त्रासदी ने
पर्वतों के देवताओं को शरणार्थी बनाया
राहत केन्द़ में लाइन में खड़े हैं ।
स्वर्ग धरती के
नरक में हो गये परिणत
पावन तीर्थ भी मानो अपावन
देखते बस रह गये भगवान
उन के भक्त सिन्धु आँखों में लिये ।
किस के पाप का परिणाम है यह महा प़लय ?
प़गति की दौड़ में अन्धे बने
मनुज की लालसा ने
प़कृति को नटी सी नचाया
त्रासदी के मंच पर
त्रासद अन्त पाया ।

ख़ुशी के आँसू

दु:ख में आँसू निकलते हैं
आँसू और दु:ख का रिश्ता
मैं ने स्वयम् भोगा है
कँटीली ज़िन्दगी की राह में
किसी ने छुई दुखती नब्ज़
नयन आकाश में घुमड़ने लगे बादल
मन की धरा गीली
युग के ताप में क्या कमी आई ?
लेकिन ख़ुशी के आँसू
देखे पिता की आँख में
मेरे पास होने की ख़बर
लघु सफलता की ख़बर कोई
जब उन्हें छू कर गई
बूढ़ी आँख में सावनी बरसात उतरी ।
आँसू दु:ख की सन्तान
पर ख़ुशी के भी सगे भाई ।

शताब्दी किस ने देखी है

हर दिन शुरु होता है
सुबह की ताज़गी
गुनगुनी धूप से
रोटी के राग के साथ
बीत जाता है
उदास शाम के धुँधलके में ।
दिन बदलता है सप्ताह में
जो शुरु होता है
नए संकल्प के साथ
हर काम लेकिन टलता है
अगले सप्ताह के लिए ।
देखते देखते
सप्ताह बदल जाता है महीने में
जो शुरु होता है नए जोश के साथ
ख़त्म होता है
रोज़ कम होने वाले मासिक वेतन सा ।
बारह महीनों बाद
आता है नया वर्ष
जो शुरु होता है ढेरों बधाइयों
नई योजनाओं के साथ
जो रह जाती बन पंचवर्षीय योजना
सिर्फ काग़ज़ पर ।
वर्षों बाद
शताब्दी किस ने देखी है
बस आदमी रोज़ जीता है
रात को मरता है ।

_ सुधेश
३१४ सरल अपार्टमैन्ट्स , द्वारिका , सैैक्टर १० , नई दिल्ली ११००७५
फ़ोन ९३५०९७४१२०