मेरी नई ग़ज़लें

मेरी कुछ ग़ज़लें

ज़बां लफ्ज़े मुहब्बत है
दिलों में पर अदावत है ।
न कोई रूठना मनना
यही तुम से शिकायत है ।
कि बस रोज़ी कमाते सब
नहीं कोई हिकायत है ।
मुहब्बत ही तो जन्नत है
अदावत दिन क़यामत है ।
पढ़ो तुम बन्द आँखों से
लिखी दिल पै इबारत है ।
ग़रीबों से जो हमदर्दी
यही सच्ची इबादत़ है ।
कभी यों ग़ज़ल कह लेता
बड़ी उस की इनायत है ।

इक्कीसवीं सदी है इक्कीसवीं सदी है
अब नेकियों पै जीती हर रोज़ ही बदी है ।
इस का न कोई चश्मा न गंगोत्री कहीं पर
बहती ही जा रही यह वक़्त की नदी है ।
पलकें बिछा के बैठे हम उन के रास्ते में
आँखों में गुज़रा जो पल जैसे इक सदी है ।
कैसे मैं आजकल की दुनिया में सफल होता
मेरी ख़ुदी के ऊपर अब मेरी बेख़ुदी है ।
गांधी न बुद्ध गौतम न रिषभ का ज़माना
अब तो ख़ुदा से ऊँची इन्सान की ख़ुदी है ।

कुछ मुक्तक

कुछ मुक्तक

आप विदेशी सफर पर हैं
नहीं अंग्रेज़ी suffer पर हैं
कौन पकड़े आप को यहाँ
आप रोज़ फेसबुक पर हैं ।
आप मुसलसल सफर में हैं
कुछ लोग अगर मगर में हैं
मैं पड़ा रह गया ज़मीं पर
आप फ़लक पै क़मर में हैं ।
मुझे भी साथ ले लिया होता
कुछ तो पुण्य भी किया होता
रोज़ शब्दों से खेलते हो
काम भी कुछ कर लिया होता ।
आप की वाणी सदा आकाशवाणी
वह शहद सी मधुर और क़ल्याणी
धरती पर उतर कर देख तो कभी लेते
कैसे जी रहे हैं मर मर के प़ाणी ।
भक्तजन की भीड़ में मैं भी लगा हूँ
नहीं मैं पण्डित पुजारी का सगा हूँ
माँ शारदे ! मुझे भी दो अपनी कृपा
शब्द की ले आरती मैं भी जगा हूँ ।

–सुधेश